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Tablighi Jamaat and Fazail e Aamaal Answers Book

Principles in the Work of Tablīgh Wisdom and Farsightedness

[41:33] 
Who can be better in words than the one who calls towards Allah, and acts righteously and says, .I am one of those who submit themselves (to Allah)?

Nothing happens without the will of Allāh and
the life of our beloved Prophet 
Muḥammad sallallahu Alaihi wasallam
is the only way to eternal success...


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Important Principles in the 
Work of Tablīgh

Molānā Saeed Aḥmed Khān 

Translated by Shaykh Abdul Mājid Iltāf

ﺑﮩﻮﺍﻭﺭ ﺑﯿﭩﯽ ﺑﯿﭩﺎ ﺍﻭﺭ ﺩﺍﻣﺎﺩ ﺳﺴﺮﺍﻝ ﻣﯿﮑﮯ ﺑﯿﭩﯽ ﮐﯽ ﺳﺎﺱ



ﺑﯿﭩﯽ v / s ﺑﮩﻮ ➖
➖➖➖➖➖➖
✅ ﺑﯿﭩﯽ ﺳﺴﺮﺍﻝ ﻣﯿﮟ ﺧﻮﺵ
ﮨﻮﺗﯽ ﮨﮯ ﺗﻮ ﺧﻮﺷﯽ ﮨﻮﺗﯽ ﮨﮯ
ﺍﻭﺭ
☑ ﺑﮩﻮﺳﺴﺮﺍﻝ ﻣﯿﮟ ﺧﻮﺵ ﮨﮯ .... ﺗﻮ ﺧﺮﺍﺏ ﻟﮕﺘﺎ ﮨﮯ
➖➖➖➖➖➖
✅ ﺩﺍﻣﺎﺩ ﺑﯿﭩﯽ ﮐﯽ ﻣﺪﺩ ﮐﺮﮮ ... ﺗﻮ ﺍﭼﮭﺎ ﻟﮕﺘﺎ ﮨﮯ
ﺍﻭﺭ
☑ ﺑﯿﭩﺎﺑﮩﻮ ﮐﯽ ﻣﺪﺩ ﮐﺮﮮ
ﺗﻮ ﺟﻮﺭﻭ ﮐﺎ ﻏﻼﻡ ﮐﮩﺎ
ﺟﺎﺋﮯ ﮔﺎ
➖➖➖➖➖
✅ ﺑﯿﭩﯽ ﺍﮔﺮ ﺑﯿﻤﺎﺭ ﮨﻮ ﺟﺎﺋﮯ ﺗﻮ ﺩﮐﮫ ﮨﻮﺗﺎ ﮨﮯ
ﺍﻭﺭ
☑ ﺑﮩﻮ ﺍﮔﺮ ﺑﯿﻤﺎﺭ ﮨﻮ ﺟﺎﺋﮯ ﺗﻮ ﺑﮩﺎﻧﮧ ﻟﮕﺘﺎ ﮨﮯ
➖➖➖➖➖➖
✅ ﺑﯿﭩﯽ ﺍﮔﺮ ﮐﻤﺰﻭﺭ ﮨﻮ ﺟﺎﺋﮯﺗﻮ ﺳﺴﺮﺍﻝ ﻭﺍﻟﻮﮞ ﮐﯽ ﻭﺟﮧ ﺳﮯ
ﺍﻭﺭ
☑ ﺑﮩﻮ ﺍﮔﺮ ﮐﻤﺰﻭﺭ ﮨﻮﺟﺎﺋﮯﺗﻮ ﮐﮩﺘﮯ ﮨﯿﮟ ﮐﮭﺎﺗﯽ ﺗﻮ ﺑﮩﺖ ﮨﮯ ﭘﺮ ﻟﮕﺘﺎ ﻧﮩﯿﮟ ﮨﮯ
➖➖➖➖➖➖
✅ ﺑﯿﭩﯽ ﮐﻮ ﺳﺴﺮﺍﻝ ﻣﯿﮟ
ﺍﮐﯿﻠﮯ ﮐﺎﻡ ﮐﺮﻧﺎ ﭘﮍﮮ ﺗﻮ ﺧﺮﺍﺏ ﻟﮕﺘﺎ ﮨﮯ ﮐﮧ ﻣﯿﺮﯼ ﺑﯿﭩﯽ ﺗﮭﮏ ﺟﺎﺋﮯ ﮔﯽ
♦ ﺍﻭﺭ
☑ ﺑﮩﻮﺳﺎﺭﺍ ﺩﻥ ﺍﮐﯿﻠﮯ
ﮐﺎﻡ ﮐﺮﮮ .... ﭘﮭﺮ ﺑﮭﯽ ﺑﮩﻮ
ﮐﺎﻡ ﭼﻮﺭ ﮐﮩﻼﺗﯽ ﮨﮯ
➖➖➖➖➖➖
✅ ﺑﯿﭩﯽ ﮐﯽ ﺳﺎﺱ ﺍﻭﺭ
ﻧﻨﺪ ﮐﺎﻡ ... ﻧﮧ ﮐﺮﯾﮟ ﺗﻮ
ﻏﺼﮧ ﺁﺗﺎ ﮨﮯ
♦ ﺍﻭﺭ
☑ ﺟﺐ ﺍﭘﻨﮯ ﮔﮭﺮ ﻣﯿﮟ ﻭﮦ
ﺑﮩﻮ ﮐﯽ ﻣﺪﺩ ﻧﮧ ﮐﺮﯾﮟ ﺗﻮ
ﻭﮦ ﺻﺤﯿﺢ ﻟﮕﺘﺎ ﮨﮯ
➖➖➖➖➖➖
✅ ﺑﯿﭩﯽ ﮐﮯ ﺳﺴﺮﺍﻝ
ﻭﺍﻟﮯ ﻃﻌﻨﮯ ... ﻣﺎﺭﯾﮟ ﺗﻮ
ﻏﺼﮧ ﺁﺗﺎ ﮨﮯ
♦ ﺍﻭﺭ
☑ ﺧﻮﺩ ﺑﮩﻮ ﮐﮯ ﻣﯿﮑﮯ ﻭﺍﻟﻮﮞ ﮐﻮ .... ﻃﻌﻨﮯ ﻣﺎﺭﯾﮟ
ﺗﻮ ﺻﺤﯿﺢ ﻟﮕﺘﺎ ﮨﮯ
➖➖➖➖➖➖
✅ ﺑﯿﭩﯽ ..... ﮐﻮ ﺭﺍﻧﯽ
ﺑﻨﺎ ﮐﺮ ﺭﮐﮭﻨﮯ ﻭﺍﻟﮯ
ﺳﺴﺮﺍﻝ ﭼﺎﮨﺌﮯ
♦ ﺍﻭﺭ
☑ ﺧﻮﺩ ﮐﻮ ... ﺑﮩﻮ
ﻛﺎﻡ ﻭﺍﻟﻲ ﭼﺎﮨﺌﮯ
➖➖➖➖➖➖
ﻟﻮﮒ ﯾﮧ ﮐﯿﻮﮞ ﺑﮭﻮﻝ
ﺟﺎﺗﮯ ﮨﯿﮟ ﮐﮧ ﺑﮩﻮ ﺑﮭﯽ ﮐﺴﯽ
ﮐﯽ ﺑﯿﭩﯽ ﮨﮯ
ﻭﮦ ﺑﮭﯽ ﺗﻮ ﺍﭘﻨﮯ
ﻭﺍﻟﺪﯾﻦ ﺑﮭﺎﺋﯽ ﺑﮩﻦ
ﺷﮩﺮ - ﺳﮩﯿﻠﯽ ﻭﻏﯿﺮﮦ ﮐﻮ
ﭼﮭﻮﮌﻛﺮﺍﭘﻜﮯ ﺳﺎﺗﮫ
ﺣﺎﻟﯿﮧ ﺯﻧﺪﮔﯽ ﮐﯽ
ﺷﺮﻭﻋﺎﺕ ﮐﺮﻧﮯ ﺁﺋﯽ ﮨﮯ
◆ ﺟﻮ ﺑﮭﯽ ﺳﺎﺱ ﺳﺴﺮ ◆
ﯾﮧ .. ﻣﯿﺴﺞ .. ﭘﮍﮪ ﺭﮨﮯ ﮨﯿﮟ
ﻭﮦ ﮐﻮﺷﺶ ﮐﺮﯾﮟ ﮐﮧ ﺑﮩﻮ
ﺍﻭﺭ ﺑﯿﭩﯽ ﻣﯿﮟ ﮐﺒﮭﯽ ﻓﺮﻕ
⭕ ﻧﮧ ﮐﺮﯾﮟ ⭕
ﺗﺒﮭﯽ ﯾﮧ ﺩﻧﯿﺎ ﺑﺪﻟﮯ ﮔﯽ ﺳﻤﺎﺝ ﺑﺪﻟﮯ ﮔﺎ ....... ﺍﻭﺭ
.... ﺁﭖ ﮐﯽ ﺑﯿﭩﯿﺎﮞ ﺑﮭﯽ ....
ﺳﺴﺮﺍﻝ ﻣﯿﮟ ﺧﻮﺷﯽ ﺳﮯ
ﺭﮨﯿﮟ ﮔﯽ
ﺍﻥ ﺷﺎﺍﻟﻠﻪ

फिरको में और मसलको के बटेएक उम्मत मुसलमान फ़िरक़ापरस्ती


फिरको में और मसलको के बटे मुसलमान ज़रूर पढ़े और सोचे
पढ़िए अल्लाह और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमसे आपस में  किस तरह से रहने को कहा है
"सब मिल कर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो और फिर्क़ों में मत बटो"|
(सुर: आले इमरान-103)
"तुम उन लोगो की तरह न हो जाना जो फिरकों में बंट गए और खुली -खुली  वाज़ेह हिदायात पाने के बाद इख़्तेलाफ में पड़ गए, इन्ही लोगों के लिए बड़ा अज़ाब हे"।
(सुर:आले इमरान -105)
"जिन लोगो ने अपने दीन को टुकड़े टुकड़े कर लिया और गिरोह-गिरोह बन गए,
आपका(यानि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का)
इनसे कोई ताल्लुक नहीं। इनका मामला अल्लाह के हवाले हे, वही इन्हें बताएगा की इन्होंने क्या कुछ किया हे"।
(सुर: अनआम-159)
"फिर इन्होंने खुद ही अपने दीन के टुकड़े-टुकड़े कर लिए, हर गिरोह जो कुछ इसके पास हे इसी में मगन हे"।
(सुर: मोमिनून -53)
""तुम्हारे दरमियान जिस मामले में भी इख़्तेलाफ हो उसका फैसला करना अल्लाह का काम हे"।
(सुर: शूरा -10)
"और जब कोई एहतराम के साथ तुम्हे सलाम करे तो उसे बेहतर तरीके के साथ जवाब दो
या कम अज़ कम उसी तरह (जितना उसने तुम्हे सलाम किया) अल्लाह हर चीज़ का हिसाब लेने वाला हे।
(सुर: निसा -86)
"अल्लाह ने पहले भी तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा था और इस (क़ुरआन) में भी (तुम्हारा यही नाम हे ) ताकि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तुम पर गवाह हो"।
(सुर: हज -78)
"बेशक सारे मुसलमान भाई भाई हैं, अपने भाइयो में सुलह व मिलाप करा दिया करो और अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम पर रहेम किया जाये"।
(सुर: हुजरात -10)

सहीह अहादीस में आया है
हज़रत अबू हुरैरह (रज़ि) से रिवायत हे की रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया- "क़सम हे उस ज़ात की जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान हे
तुम जन्नत में तब तक दाखिल नहीं हो सकते जब तक की ईमान वाले न हो जाओ और
"तुम तब तक ईमान वाले नहीं हो सकते जब तक की"
"आपस में मुहब्बत न करने लग जाओ"
तो क्या में तुम्हे ऐसी चीज़ न बता दू की जब तुम इसको करोगे तो आपस में मेहबूब हो जाओगे??
फ़रमाया-अपने दरमियान सलाम को फैलाओ"।(यानी खूब सलाम किया करो)
(सहीह इब्ने माजा)
"अबू मूसा (रज़ि) से रिवायत हे की नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया-"एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान से ताल्लुक़ एक इमारत की तरह हे,
जिसका एक हिस्सा दूसरे हिस्से को मज़बूत करता हे फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक हाथ की उंगलियां दूसरे हाथ की उंगलियो में डाली (और इस अमल से यह समझाया की मुसलमानो को आपस में इस तरह जुड़े रहना चाहिए और एक दूसरे की ताक़त का ज़करिया होना चाहिए)
( सहीह बुखारी)
नौमान बिन बशीर (रज़ि) से रिवायत हे की नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया -"तुम मोमिनो को देखोगे की वह एक दूसरे पर रहम करने में और एक दूसरे का साथ निभाने में और शफ़क़त करने में
"एक जिस्म की तरह हें"
जब जिस्म के एक हिस्से में तक़लीफ़ हो तो सारा जिस्म दर्द और बुखार से कराहता हे"।
(सहीह मुस्लिम)
नौमान (रज़ि) बयान करते हे की नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया-
"तमाम मोमिनीन एक जिस्म की तरह हे"
जब इसकी आँख में तकलीफ होगी तो सारे जिस्म में तक़लीफ़ होगी और अगर इसके सर में दर्द होगा तो सारे जिस्म में दर्द होगा (इससे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने समझाया  की जिस तरह से जिस्म में कही भी तक़लीफ़ हो तो सारा जिस्म उसे महसूस करता हे इसी तरह अगर मुसलमानो पर कही भी कोई तक़लीफ़ पहुच रही हो तो हमे भी उसे महसूस करना चाहिए और उसके खिलाफ कहना चाहिए)
(सहीह मुस्लिम )
क्या आज हम उम्मत के हर फर्द को अपने जिस्म का हिस्सा समझते हें❓❓
क्या उम्मत की हर तकलीफ पर हम भी तकलीफ महसूस करते हैं❓❓
क्या काफिरो की चालो से हम भी मुतास्सिर हो गए और एक दूसरे क सलाम का जवाब देना भी गवारा नहीं करते❓❓
क्या अल्लाह और उसके रसूल से बढ़ कर हमारी बात हो गई के हम हमारे भाइयो से ही नफरत करने लगे❓❓
क्या आज हम उम्मत के हर फर्द से वही उल्फत मुहब्बत और भाईचारगी का रवैय्या रखते हैं जो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमे सिखलाया ❓❓
या हम भी उन्ही फिरकापरस्त तागूती ताक़तों का शिकार हे जो उम्मत को सिर्फ तोडना चाहती हे।
जुड़ कर रहिये एक ताक़त बनिए
अल्लाह हमे हर फ़िरक़ापरस्ती से हिफाज़त फरमाये और हमारे दिलों में मुहब्बत उल्फत नरमी और भाईचारगी पैदा फरमाये.....
आमीन..
किसी की चालो काj शिकार मत बनिए बस एक उम्मत बनिए
अल्लाह आपको अजरे अज़ीम अता फरमाये...
आमीन

Musalamanon ki zillat Ruswai ki Wajah



Ist View
 Ilm ka fuqdan ek wajah hai jise door karna zaruri hai.
Lekin ummat ke zillat o ruswaee ki wajoohat par bahut ghaur fikr ki zaroorat hai.
Bahut se wajoohat jo batae jate hain woh asal marz nahin balki symptoms (awariz) hain. Che jaeke asal marz ki tashkheesh aur sahi ilaj na ho awariz ki islah namumkin hai.
Allah pak amal ki taufeeq nasib farmae.

 2nd View

Yeh kehna ke aaj kal logo mei ilm ki kami hai, mai samajhta hu ke yeh iss sadi ka sab se bada jhoot hai.
Kami ilm ki nahi, balke tarbiyat aur taqwa ki hai.
Chunaanche, mukhtalif uloom-o-funoon aur unn uloom se behrawar muhaqqiqeen wa ulama ki jitni badi tadaad aaj hai, kabhi nahi rahi.
Awaam toh awaam, hum maulviyo ko bhi din raat uloom aur maraakiz e uloom ki fikar hai, farzi o ghair farzi madaris ki fikar hai, lekin koi ye nahi kehta ke uloom toh bahot hain, aaj qaum o millat mei tarbiyatgaahon aur islaahi maraakiz ki zarurat hai.
Arrey janaab, aaj ke din uloom toh aap ki dehleez pe dawat-e- tehseel de rahe hain. Aap ke mobile pe uloom ka ambaar hai, internet ki shakl mei computer pe uloom ka samandar thaante maar raha hai, aaj ka aalim angrezidaan bhi hai, mutarjim bhi hain, professor, lecturer aur Engineer bhi hain.
Aaj ka imaam taajir bhi hai, mufassir muqarrir aur badi badi tanzeemo ka qaaed bhi hai.
Doosri taraf, aaj ka professor aur engineer namazi bhi hai, muqarrir bhi hai, muballigh aur misannif bhi hai.
Aaj ka BA pass, Haafiz-e- Qur'an bhi hai, A/c technician bhi hai.
Aaj ki dokhtaraan-e-millat ke paas uloom ka ambaar hai, deen ke hawaale se iss qadar faazilaat ka amboh hai ke ek ek Jaamiyatul Laundiyaat mein teen-teen chaar-chaar sheikhatul hadeesa hain. Inn ki jholiyo mei iss qadar uloom hain ke mardo ke naak mei dam kar rakha hai.
Filhaal itna hi. Iss ummeed ke saath ke koi bataye ke kahaan hai uloom ki kami?

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